शनिवार, 7 सितंबर 2013

मोटर यान अधिनियम 1988

Child Rights and Law
मोटर यान अधिनियम 1988
भारत लगातार विकसित होते देशो में से एक देश है, जहां पर विकास हो रहा हे चारों तरफ चोड़ी सड़के बन रही है, वहीं दूसरी तरफ हवा से बाते करते मोटरयान भी बनाये जा रहे हैं देश की आबादी लगभग 120 करोड़ है और सरकार के पास ऐसे साधन नहीं है कि सभी लोगों को यातायात सुविधाऐं उपलब्ध कराई जावें। उन्हें रेल सुविधा भी उपलब्ध नही के बराबर है प्रायवेट वाहन कार, टेक्सी से लोग यात्रा करते हैं जिससे महानगरो में यातायात में दबाब बढ़ा हैं मीलों लम्बी वाहनो की कतारें लगती है

 
ऐसी स्थिति में मोटरयान अधिनियम के अंतर्गत वाहन का परिचालन किया जावे यह आवश्यक है। लेकिन भारत में देखा गया है कि मोटरयान चालक मालिक मोटरयान अधिनियम का पालन करने में लापरवाही बरतते हैं और बहुत उपेक्षा लापरवाही से वाहनो का परिचालन करते हैं जिससे प्रत्येक दिन अनेको दुर्घटनाऐं होती है। जिससे हजारों लोगो की मौत होती है तथा कई लोगों का जीवन विकलांग होने के कारण बर्बाद होता है


यही कारण है कि भारत में यातायात नियमो का कठोरता से पालन हो और मोटरयान अधिनियम के अनुसार वाहनो का परिचालन हो। ऐसी जरूरत तेजी से मेहसूस की जा रही है
सर्वप्रथम किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान में मोटर चलाने के लिये उसके पास लायसेंस होना आवश्यक है मोटरयान अधिनियम की धारा 3 में इसकी अनिवार्यता बताई गई है और लायसेंस रहने पर उसके दण्ड को धारा 181 में बताया गया है

 
इसी प्रकार अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान में मोटरयान नहीं चलाया जाना चाहिये 50 सी0सी0 से कम क्षमता का वाहन 16 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को चलाना चाहिये 50 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को किसी भी मोटरयान चलाने ओर भारसाधक अधिकारी पर अधिनियम की धारा 5 के अंर्तगत यह उत्तरदायित्व सोंपा गया है वह बिना लायसेंस और निर्धारित आयु सीमा होने पर अपने वाहन का परिचालन नहीं करवाये गये है। यदि वह ऐसा करता है तो अधिनियम की धारा 180 के अंतर्गत उसे दंडित किया गया है इस प्रकार लायसेंस होना अनिवार्य है


मोटरयान का रजिस्ट्ेशन होना अनिवार्य है रजिस्ट्ेशन होने की दशा में वाहन चलाने वाला और वाहन चलवाने वाला दोनो को दोषी माना गया है इसी प्रकार यदि परिवहनयान को परिवहन के लिये उपयोग किया गया है तो उसका परमिट लिया जाना आवश्यक है बिना परमिट के वाहन चलाया जाना दंडनीय है। इसके अतिरिक्त हेलमेट पहनकर वाहन चालाना चाहिये शराब पीकर वाहन चलाया लाना ड्ायबर को निर्धारित वेश-भूषा में वाहन चलाना अनिवार्य है ऐसा करने पर धारा 177 मोटरयान अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। मोटरयान अधिनियम के अंतर्गत पहले दण्ड के प्रावधान कम थे अब उन्हें अधिक कठोर बना दिया गया है वर्तमान समय में धारा 177 का उल्लघंन होने पर सौ रूपये की जगह एक हजार रूपये अर्थदंड किया गया है तथा लायसेंस परमिट क्षमता से अधिक वजन ढोने पर कम से कम पांच हजार रूपये अर्थदंड दो हजार रूपये की जगह किया गया है
इस प्रकार मोटरयान अधिनियम कठोरता से लागू करने के प्रयास किये जा रहे है जो जागरूकता से यातायात नियमो को कठोरता से अनुशासन लागू करने के लिय प्रभावी होगें


स्कूली बस के संचालन के संबध में मान्नीय उच्च न्यायालय के दिशा निर्देश-
मोटरयान अधिनियम 1988 की धारा-2-47 के अनुसार एक शैक्षिक संस्थान बस एक परिवहन वाहन है और इसलिए सडक पर इसके परिवहन के लिए एक परमिट की आवश्यकता है यह परमिट बिना फिटनेस टेस्ट के हर साल इसका नवीनी करण नहीं होना चाहिए।
इसके लिए स्कूल बसों के चालको को यातायात अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वह विधि अनुसार कार्यवाही करें इसलिए मान्नीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बच्चो को ले जाने संबंधी स्कूल बसो की सुरक्षा के संबंध में कुछ दिशा निर्देश निर्धारित किये गये है जो निम्नलिखित है-

1- स्कूल बसों में पीले रंग चित्रित किया जाना चाहिए।
2- स्कूल बस वापस और बस के मोर्चे पर लिखा होना चाहिए। यह बस काम पर रखा
जाता है तो स्कूल ड्यूटी पर स्पष्ट रूप से संकेत दिया जाना चाहिए।
3- बस एक प्राथमिक चिकित्सा बाॅक्स होना चाहिए।
4- बस निर्धारित मानक की गति राज्यपाल केसाथ सुसज्जित किया जाना चाहिए।
5- बस की खिडकियां क्षैतिज ग्रिल्स के साथ सुजज्ति किया जाना चाहिए।
6- बस में एक आग बुझाने की कल होना चाहिए।
7- स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर बस पर लिखा होना चाहिए।
8- बस के दरवाजे विश्वसनीय ताले के साथ सुसज्जित किया जाना चाहिए।
9- सुरक्षित रूप से स्कूल बेग रखने के लिए सीटों के नीचे फिट स्थान नहीं होना चाहिए
10- बच्चो को भाग लेने के लिए बस में एक योग्य परिचर होना चाहिए।
11- बस या एक शिक्षक में बैंठे किसी भी माता पिता या अभिभावक भी इन सुरक्षा नियमों
को सुनिश्चित करने के लिए यात्रा कर सकते हैं
12- चालक भारी वाहनों ड्ायविंग के अनुभव के कम से कम 5 साल होनी चाहिए।
13- लाल बत्ती कूद लेन अनुशासन का उल्लंघन या अनधिकृत व्यक्ति को ड्ायवर के लिए अनुमति देता है जैसे अपराधो के लिए एक वर्ष में दो बार से अधिक चालान किया गया है जो एक ड्रायवर नियोजित नहीं किया जा सकता
14- अधिक तेजी, शराबी ड्राइविंग और खतरनाक ड्राइविंग आदि के अपराध के लिए एक बार भी चालान किया गया है जो एक ड्राइवर नियोजित नहीं किया जा सकता।
यह देखा गया है कि उपरोक्त दिशा निर्देशो का पूर्णतः पालन नहीं हो रहा है इसका पालनहो यह जिम्मेदारी प्रशासन की है जिसको इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है























सोमवार, 19 अगस्त 2013

संविधान मंे मूल कर्तव्य के अनुच्छेद 51 में कहा गया है कि ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के लिए घातक हैं। इसी प्रकार 6 वर्ष की आयु से 14 वर्ष की आयु के बालकों के माता-पिता संरक्षकों का यह कर्तव्य होगा कि शिक्षा प्रदान करें इसलिए शिक्षा को मूल अधिकार बना दिया। बालकों के लिये अनिवार्य शिक्षा के लिये कानून बनाया गया है।    
        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम-2009 को चुनौती देने वाली याचिका राजस्थान राज्य विरूद्ध भारत संघ 2012 भाग-6 एस.एस.सी. पेज-1 में दिनॉक-04.12.12 को इस अधिनियम को वैघ ठहराया था एवं निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के संबंध में दिशा-निर्देश दिये गये।     इसके बाद पुनः माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा शिक्षा-दिक्षा स्कूल में स्थिति में सुधार-के मामले में पर्यावरण एवं उपभोक्ता संरक्षण फांउण्डेशन वि0 दिल्ली राज्य सि0 रिट याचिका 631/2004 में दिनॉक-10.03.2012 को मान0 उच्चतम न्यायालय ने दिशा-निर्देश जारी किये-   
    1.    सरकार केन्द्र और राज्य स्तर पर बच्चों के अधिकारों की जांच             हेतु बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना करेगी।
    2.    बाल संरक्षण अधिकार आयोग मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के लिये         बच्चों के अधिकार से संबंधित शिकायतों की जॉच करेगा।
    3.    बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा             उपायों की समीक्षा करेगी और उनके प्रभावी कार्यान्वयन हेतु             सिफारिश करेगी।
    4.    प्रत्येक स्कूल में पानी की सुविधा पर्याप्त क्लास रूम लड़के-             लड़कियों के लिये अलग-अलग शौचालय संबंधी दिशा निर्देश             दिये गये।
    5.    यह दिशा निर्देश राज्य के स्वामित्व, निजि, स्वामित्व, सहायता             प्राप्त, गैर सहायता प्राप्त, अल्पसंख्यक, गैर अल्पसंख्यक सभी             स्कूलों पर लागू होंगे।
        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा लापता बच्चों के सभी मामलों में एफ.आई.आर. के अनिवार्य पंजीकरण के आदेश याचिका कर्ता बचपन बचाओं
               
आंदोलन विरूद्ध भारत संघ और ओ.आर.एस. संघ रिट याचिका सिविल नम्बर-75 वर्ष 2012 में पारित किये गये हैं जो निम्नलिखित हैंः-
    1.    इन सभी मामलों के संबंध में एफ.आई.आर. अनिवार्य रूप से             रिकार्ड की जाये।
    2.    राज्यों में विशेष किशोर पुलिस इकाई लापता बच्चों के संबंध में             बनाई जाये।
    3.    ऐसे मामलों में एफ.आई.आर. दर्ज होते ही उचित कदम तुरंत             उठाना चाहिए।
    4.    ऐसे लापता बच्चों का एक डाटाबेट तैयार किया जावे।
    5ण्    ूूूण् जतंबा जीमउमेेपदह बीपसकण्हवअण्पद
        ूूूण् बीपसकसपदमपदकपंण्वतहण्पद
        ूूूण्ेजवच तंपिबापदहण्पद  बच्चों से संबंधित इन तीनों वेबसाइट में             जानकारी अपलोड की जाये।
    6.     प्रत्येक लापता बच्चों की फाइल व डाटा कम्प्यूटर में अपलोड             किया जाना चाहिए ताकि इनके ट्रेंसिंग के प्रयास का उपयोग             किया जाना चाहिए।
    7.    सी.सी.टी.एन.एस. के माध्यम से खोया बचपन बेव साइट पर इसे         शामिल करना चाहिए।
    8.    डी0आई0जी0 रेंक के नीचे के अधिकारी को नोडल अधिकारी             घोषित किया जाये।
    9.    वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मामले की जॉच कर पर्यवेक्षण करेगी।
    10.    लापता बच्चों की मासिक रिपोर्ट भेजी जानी चाहिये, ताकि उनका         मिलान हो सके।
    11.    बच्चों का आयोग भीख मांगने, ऊॅट जाकिंग, वैश्यावृत्ति                 प्रीडियोंफिलिप मेट जॉच की जानी चाहिये।
               
    12.    इसके लिये सी0आई0डी0 ग्राम पंचायत की सहायता ली जा             सकती है।
    13.    सीमावर्ती स्थानों की चौकसी, रेल्वे स्टेशन, बस स्टेण्ड, सड़क             मार्ग की नियमित चैंकिग की जा सकती है।
    14.    1099 टोल फ्री नम्बर की सहायता ली जा सकती है। निगरानी             समिति हेल्पलाइन बनाई जा सकती।
        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा लापता बच्चों के संबंध में एफ0आई0आर0 पंजीकरण के साथ ही साथ प्रत्येक राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई हर राज्य में विशेष रूप से स्थापित की जाने पर जोर दिया है। न्यायालय के निर्देशानुसार  कम से कम पुलिस स्टेशन मंे तैनात एक अधिकारी को यह शक्ति दी जानी चाहिए कि वह विशेष किशोर पुसिल इकाई के रूप में कार्य करे। इस संबंध में राष्ट्र्ीय मानव अधिकार आयोग को सचेत किया गया है कि वह देखे कि इस संबंध में क्या कार्यवाही हो रही है। इससे राज्य में बच्चों के लापता या बच्चों की तस्करी कम होगी।
        प्रत्येक राज्य में किशोर न्यायालय अधिनियम-2000 की धारा-63 में किशोर न्याय नियम 2007 के अनुसार प्रत्येक राज्य में विशेष किशोर पुलिस इकाई की स्थापना नहीं की गयी जबकि सभी जिलों और सभी पुलिस थानों में पुलिस इकाईयों और किशोर बाल कल्याण अधिकारी की नियुक्ति अनिवार्य है और उन्हें राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के द्वारा प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।  
        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भारत में सर्कस में बाल कलाकार का उपयोग प्रतिबंधित किया गया है। हमारे देश में सर्कस लोकप्रिय है और सर्कस में बच्चे काम करते थे इस संबंध में मान0 उच्चतम न्यायालय के द्वारा 14 वर्ष से कम उम्र के बाल कलाकारों को उपयोग करने से सर्कस मालिकों पर प्रतिबंध लगा दिया। यह देखा गया कि सर्कस में अव्यस्क बच्चों को उनकी मर्जी के खिलाफ दिन में 5 बार प्रदर्शन के लिये मजबूर किया जाता था और
               

सर्कस के लिये बच्चो की तस्करी की जाती थी। सर्कस में उनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता था। इसे बालश्रम माना गया।
    इस संबंध में बचपन बचाओं आंदोलन विरूद्ध भारत संघ सिविल याचिका क्रमांक-51/2006 में निम्नलिखि दिशा-निर्देश जारी किये गयेः-
    1.    14 वर्ष से कम उम्र के बाल कलाकार सर्कस में काम नहीं करेंगे।
    2.    सर्कस में काम कर रहे अव्यस्क बच्चों को दिन में पांच बार             प्रदर्शन के लिये मजबूर नहीं किया जायेगा।
    3.    प्रत्येक राज्य सरकार किशोर घरों की अर्द्ध वर्षिक रिपोर्ट प्राप्त             करेगी जिसमें बच्चों की संख्या, स्थिति, पुर्नवास और वर्तमान             स्थिति का उल्लेख होगा। इसके लिये राज्य सरकार प्रत्येक जिले         में किशोर न्याय सेल खोलेगी।
    4.    24 घण्टे घरों में चलने वाले सभी गैर सरकारी संगठनों का जिला         कलेक्टर में पंजीकरण होगा उनके नाम पते सहित पूर्व विवरण,             पदाधिकारियों के नाम, मोबाइल नम्बर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित         किये जाएॅगे इसका एक डेटाबेट तैयार किया जायेगा।
    5.    सड़क किनारे ढाबे (भोजनालय) और मैकेनिक की दुकानों में काम         करने वाले बच्चों को बचाने और उनका पुनर्वास करने में एक             मजिस्ट्र्ेट की नियुक्ति, जिला मजिस्ट्र्ेट द्वारा की जायेगी। जिसके         द्वारा ऐसे बच्चों की बचाव और निगरानी करने के निर्देश दिये             जायेंगे।
    6.    केन्द्रीय दत्तक ग्रहण रिसोर्स एजेन्सी द्वारा अपनी वार्षिक रिपोर्ट             परिवार समाज कल्याण को दी जायेगी।
    7.    समेकित बाल संरक्षण योजना के अंतर्गत केन्द्र और राज्य सरकार          अर्द्धवार्षिक रणनीति योजना तैयार करेगी।
               

    8.    प्रत्येक राज्य सरकार को बच्चों के संबंध में योजनाओं के             कार्यान्वयन के लिये जिम्मेदार बताया गया बाल कल्याण समितियों         को जिला जज की देखरेख में रखने की सिफारिश की गयी है।
    9.    घरों में बच्चों की अच्छी देख भाल हो इसके लिये पालक             ध्यान-योजना की सिफारिश की गयी है।
    10.    केन्द्र सरकार बच्चों के लाभ और कल्याण के लिये एक स्वतंत्र             प्राधिकरण बनायेगी, जिससे आवंटित धन का वास्तव में बच्चों के         कल्याण के लिये उपयोग होगा।
        माननीय उच्चतम न्यायालय बच्चों के शोषण से निपटने के लिए एक दीर्घकालिक और व्यवस्थित योजना बनाये जाने हेतु दिशा निर्देश जारी किये गये।
        अपर्याप्त बजट आवंटन पर चिंता व्यक्त की गई है। ऑकड़ो के अनुसार भारत में दुनियॉ की 19 प्रतिशत बच्चों की आबादी 1/3 से नीचे लगभग 44 लाख बच्चे की आबादी 18 वर्ष से कम है। इसके बाद भी वर्ष 2005-06 में कुल बजट का 3.86 प्रतिशत और 2006-07 में 4.91 प्रतिशत खर्च किया गया। जब कि देश के बच्चे देश का भविष्य हैं वे क्षमता विकास के अग्रदूत हैं। उनमें गतिशीलता नवाचार, रचनात्मकता परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक है। हम स्वस्थ्य और शिक्षित बच्चों की आबादी का विकास करे ताकि आगे चलकर वे अच्छे नागरिकों के रूप में देश की सेवा कर सके। इन्हीं बातों का ध्यान रखते हुये बाल कल्याण के लिये बजट बढ़ाने का कहा गया है।
        माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडू सिविल रिट याचिका क्रमांक-465/86 में बाल श्रम उन्मूलन के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किये गये थे जो निम्नलिखित हैंः-
    1.    काम करने वाले बच्चों की पहचान के लिये सर्वेक्षण किया जाए।
               

    2.    खतरनाक उद्योग में काम कर रहे बच्चों की वापसी हो उन्हें             उचित शिक्षा संस्थान में शिक्षित किया जाये।
    3.    बाल कल्याण बवदजतपइनजपवद / त्ेण् 20ए000 की स्थापना की गयी है         जिसमें प्रति बच्चे के हिसाब से नियोक्ता द्वारा भुगतान किया             जाये।
    4.    बच्चों के परिवार के व्यस्क सदस्य को रोजगार किया जायेगा।
    5.    राज्य सरकार कल्याण कोष में येागदान देगी।
    6.    बच्चों के परिवार को वित्तीय सहायता दी जायेगी।
    7.    गैर खतरनाक व्यवसाय मेें बच्चों को काम पर नहीं लिया जायेगा।
        मान0 उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देश के अनुरूप वर्ष 2006 में बाल श्रम निषेध कानून की स्थापना की गयी जिसमें 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी काम धंधों में नहीं लगाया जायेगा।   
   
                                उमेश कुमार गुप्ता
                           

























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