’’सुशासन की कुंजी’’ सूचना का अधिकार
भारत के संविधान मंे लोकतंत्रात्मक गणराज्य की स्थापना की गई है, जिसमें जनता में से जनता के द्वारा जनता के लिए, चुने व्यक्तियों द्वारा राज्य किया जाता है । इस प्रकार जनता का राज्य होता है । ऐसे राज्य मंे प्रत्येक नागरिक, वर्ग, को यह जानने का अधिकार है कि उसके खून-पसीने की कमाई से एकत्र किये गये टैक्स को सरकार किस प्रकार खर्च कर रही है । उससे प्राप्त राशि का किस प्रकार लोक प्राधिकारी लोक संस्थाएं उपयोग कर रही है। ऐसी सूचना की पारदर्शिता की अपेक्षा प्रत्येक व्यक्ति सरकार से करता है । इसी पारदर्शिता को लागू करने के लिए सूचना अधिकार अधिनियम 2005 की स्थापना की गई है । जिसे आगे संक्षिप्त में आर.टी.आई. कानून कहा गया है ।
अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी नागरिकों को सूचना का अधिकार होगा सूचना के अधिकार को धारा-2आई में परिभाषित किया गया है ।जिसके अनुसार सूचना का अधिकार से अभिप्रेत है इस अधिनिमय के अधीन पहंुच योग्य सूचना का जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा या उसके नियंत्रणाधीन धारित है, अधिकार अभिप्रेत है प्रमाणित प्रतिलिपि लेना,
1 सूचना प्राप्त करने के लिए लिखित मे अनुरोध किया जाएगा । अनुरोध प्राप्ति के 30 दिन के भीतर ऐसी फीस संदाय किये जाने पर सूचना उपलब्ध कराई जाएगी ।
2 यदि जानकारी किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित है तो वह 48 घंटे के अंदर उपलब्ध कराई जायेगी ।
3 30 दिन के अंदर अपील की जाएगी।
दूसरी अपील 90 दिन के अंदर केन्द्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना आयोग को दी जाएगी।
4 बिना किसी युक्तियुक्त कारण के सूचना न देने पर कोई आवेदन प्राप्त किये जाने पर निश्चित समय पर सूचना न दिये जाने पर असदभावना पूर्वक सूचना दिये जाने पर, जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना दी है या
ृ5 उस सूचना को नष्ट कर दिया है, जो अनुरोध का विषय थी या किसी रीति से सूचना देने में बाधा डाली है तो वह ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जब तक आवेदन प्राप्त किया जाता है या सूचना दी जाती है,
6 दो सौ पचास रूपये की शास्ति अधिरोपित करेगा, तथापि ऐसी शास्ति की कुल रकम पच्चीस हजार रूपये से अधिक नहीं होगी ।
अधिनियम को अध्यारोही प्रभाव दिया गया है । अन्य न्यायालय की अधिकारिता वर्जित की गई है ।
आम व्यक्ति को लोकहित में सूचना का अधिकार प्रदान किया गया है ।
जो विषय वस्तु लोकहित से संबंधित है । वह सूचना के अधिकार में शामिल है ।
सूचना के अधिकार से आम जनता को यह लाभ प्राप्त है कि लोक प्राधिकारी जो कार्य करेंगे उसकी जानकारी रहेगी ।
यदि वह मनमाने तौर पर काम करते है तो उस पर रोक लगाई जा सकेगी ।
यदि उनके द्वारा सरकारी कार्य करने में हीला हवाला किया जाता है, वे कार्य में उपेक्षा बरतते है, जिससे शासकीय कार्य में मनमानी भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद को बढावा देते है तो उन पर रोक लगाई जा सकेगी ।
आर.टी.आई एक्ट से यह भी लाभ है कि लोकहित के कार्यो की सुनवाई समय पर हो सकेगी ।
समुचित राहत आम नागरिकों को समय पर प्राप्त होगी।
सराकरी सेवको में कर्तव्य परायणता, जनसेवा की भावना जागृत होगी । जो इस अधिनियम का मूल्य उददेश्य है।
सूचना के अधिकार से देश को यह लाभ है कि लोक प्राधिकारी के कृत्यों में पारदर्शिता आएगी तथा नागरिकों के प्रति जवाबदेही बढेगी ।
उचित ढंग से कार्य करने की भावना/मानसिकता विकसित होगी ।
देश को स्वच्छ प्रशासन प्राप्त होगा ।
नागरिकों की सामान्य सुविधाए प्राप्त करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पडेगा
लोकहित में मानक स्तर के कार्य होंगे ।
घटिया निर्माण कार्य पर रोक लगेगी ।
यही कारण है कि सूचना का अधिकार ’’सुशासन की कुंजी’’ माना गया है ।
इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी रिकार्ड चुस्त दुरूस्त सूची बद्ध कम्प्यूटरीकृत रखे जावे।
आर.टी.आई. कानून लागू होने के बाद सरकारी विभागों से मांगी जा रही सूचनाओं के कारण अनेक घोटालों का पर्दाफास हुआ है ।
घोटालो में फसने वाले नेताओं और अफसरों की नींद हराम हुई है ।
आर.टी.आई. की सूचना जुटाकर घोटालों का भंडफोड करने में अनेक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है ।
पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें समय-समय पर डराया धमकाया जाता है । समाज के संगठन काम करने वाले ऐसे आर.टी.आई. कार्यकताओं की सुरक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है । सरकार ऐसे कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करें ।
आर.टी.आई. कानून ने भ्रष्ट नेता और अफसरों की नाक में दम कर रखा है । सही कारण है कि अवैध खनन करने वालो के कारनामों को उजागर करने वाले गुजरात के अमित जेठवा जमीन घोटालों का सच सामने लाने वाले पुणें के सतीश सेठी औरअहमदाबाद के नदीम सैयद जैसे तमाम कार्यकर्ताओं को अपनी जान तक गवानी पडी है । सूचना का अधिकार कानून जैसे-जैसे सशक्त बन कर उभर रहा है । वैसे-वैसे भ्रष्ट लोगों की लाॅबी भी सामने आ रही है । लेकिन चंद लोगों की हत्या या कुछ लोगों को डराने धमकाने से सूचना के अधिकार की मुहीम रूकने वाली नहीं है ।
जरूरत है तो ऐसे लोगों का साथ देने का और ऐसे प्रशासन पर दबाव बनाने की कि वह भ्रष्ट नेता, अफसरों, के प्रभाव में आकर ऐसा कोई काम न करने पायें जिससे कानून से खिलवाड होता दिखाई दे।
उमेश कुमार गुप्ता
सूचना क्रांति
अधिनियम के प्रमुख प्रावधान:-
सूचना पाने का अधिकार अधि., 2005 सूचना की स्वतंत्रता अधि., 2002 के स्थान पर लाया गया है सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 2002 एक कमजोर तथा निष्प्रभावी कानून सिद्ध हुआ है. नए अधिनियम के प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित प्रकार हैं-
1ण् सभी नागरिकों को सूचना तक पहॅंच का अधिकार सुस्पष्टतया प्रदान करना।
2ण् सभी लोक अधिकारियों के लिए इस प्रकार की सूचना के प्रसार को एक बाध्यता बनाया जाना.
3ण् केन्द्र एवं राज्य स्तर पर एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र निकाय के रूप में सूचना आयोगों की स्थापना करना. ये आयोग सूचना प्राप्त करने के अधिकार को प्रोन्नत करेंगे तथा अधिनियम के प्रावधानों को लागू करेंगे. ये निकाय अपीलीय अधिकरण के रूप में कार्य करेंगे तथा इन्हें दीवानी न्यायालय के अधिकार प्राप्त होंगे. अधिनियम में सूचना आयोग को ऐसी शक्तियाॅं प्रदान की गई हैं जो लोक अधिकारियों को सूचना देने से मना करने से हतोत्साहित करेंगी।
4ण् इस अधिनियम के अधिकार क्षेत्र में निम्नलिखित को रख गया है-
केन्द्र एवं राज्य सरकारों के सभी मन्त्रालय तथा विभाग सुरक्षा एवं इंटेलीजेन्स संगठनों को छोड़कर।
पंचायती राज संस्थाएं तथा स्थानीय नगर निकाय।
सरकार से वित्तपोषित गैर-सरकारी संगठन।
केन्द्र एवं राज्य सरकारों के स्वामित्व वाले निगम तथा कंम्पनियाॅं।
5. सूचना प्राप्त करने के अधिकार में अभिलेखों की जाॅंच पड़ताल तथा आॅंकड़ों की प्रति प्राप्त करना भी शामिल है
6. अधिकारियों को सूचना प्राप्त करने संबंधी आवेदन प्राप्त होने के 48 घण्टे के भीतर इस
पर कार्यवाही करनी होगी. यदि यह जीवन और स्वतंत्रता का मामला है, तो ;.
7. सूचना प्रदान कररने में हीला-हवाली करने वाले अधिकारियों के विरूद्ध प्रशासनिक
कार्यवाही की जाएगी तथा दोषी अधिकारी दण्डित होंगे.
8. इस अधिनियम के कतिपय प्रावधान इस अधिनियम के लागू होने के साथ ही लागू हो
जाएंगे. शेष प्रावधान अधिनियम लागू होने के 120 दिन के भीतर लागू हो सकेंगे. इस 120
दिन की अवधि के भीतर केन्द्र एवं राज्य सरकारों के अधिकारियों को सूचना प्रदान करने
के लिए एक तंत्र बनाना होगा.
9. जन-सूचना अधिकारियों को नागरिकों द्वारा माॅंगी गई सूचना यथासंभव 30 दिन के भीतर
देनी होगी।
10. सूचना प्राप्त करने के लिए किसी नागरिक द्वारा दिए गए आवेदन को लेने से मना करना,
समय से सूचना न देना या आधी-अधूरी सूचना देना, गलत सूचना देना, वांछित सूचना को
नष्ट करना या भ्रामक सूचना देना आदि के लिए कठोर दण्ड का प्रावधान है,
11.यदि किसी स्तर पर सूचना पाने के अधिकार अधिनियम-2005 तथा आॅफीशियल सीक्रेट्स
अधिनियम, 1923 के प्रावधानों के बीच टकराव की स्थिति आती है, तो सूचना पाने के
अधिकार अधिनियम-2005 के प्रावधानों को ही प्रमुखता प्राप्त होगी।
;1द्ध स्वतंत्र अपीली व्यवस्थातंत्र।
;2द्ध कानून के मुताबिक सूचना प्रदान करने में असफल रहने पर दण्ड का प्रावधान।
;3द्ध सूचना तक पहॅुंच के लिए प्रभावी तंत्र।
;4द्ध अधिकारियों द्वारा सूचना प्रकट करना।
सूचना पाने अधिकार अधिनियम-2005 कितना प्रभावी तथा लाभकारी सिद्ध होगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इस अधिनियम को सही अर्थों में लागू करने के लिए केन्द्र। एवं राज्य सरकारें किस सीमा तक तैयार हैं. यह अधिनियम कानून की किताबों में तो होगा ही साथ ही इसके प्रावधान अब केवल अतिक्रमण ही नहीं होंगे, बल्कि वे सरकारी अधिकारियों के लिए बाध्यकारी होगें.
आधुनिक लोकतंत्र ने जवाबदेही की अवधारणा को अधिक विस्तृत एवं प्रत्यक्ष रूप में अंगीकार किया है. जवाबदेही का मूल्यांकन उपलब्धियों तथा सेवा प्रदान करने जैसे मानकों के आधार पर किया जाता है. नागरिकों के लिए केवल इतना ही महत्वपूर्ण नहीं है कि सरकार उनकी सुख-सुविधा, सुरक्षा एवं सामाजिक न्याय हेतू कितनी व्यवस्था करती है, बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि लोकहितार्थ गठित तंत्र कितने प्रभावकारी ढंग से अपने दायित्वों का निर्वाह करता है. और इसका मूल्यांकन इस बात से है कि लोक सेवक किस सीमा तक जनता के प्रति जवाबदेह हैं. इस जवाबदेही का पता जनता को उसी दशा में हो सकेगा, जबकि प्रशासन पारदर्शी हो तथा उसके कृत्यों की जानकारी जनता को बिना रोक-टोक के होती रहे, वर्तमान कानून इस स्थिति को ही सुनिश्चित करेगा ऐसी आशा की जा सकती है, प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहनसिंह ने इस कानून को भ्रष्टाचार और अक्षमता से लड़ने वाला कारगार हो सकने वाला अस्त्र बताया है।
आजादी के 58 वर्षों बाद विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में सूचना का अधिकार कानून निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेही और पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया और इसने 8 वर्षों में जो लोकप्रियता हासिल की है, संभवतः वह किसी अन्य कानून ने हासिल नहीं की है। प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॅानिक मीडिया में इस कानून के उपयोग के बाद निकलने वाली जानकारियों ने भ्रष्टाचार करने वाले देशद्रोहियों के जीवन में भूचाल ला दिया है। राष्ट्रपति भवन में बहुमूल्य गिफ्टों की अव्यवस्थित प्रबंधन की बात हो, स्पैक्ट्रम घोटाला, काॅनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोल ब्लाॅक घोटाला, म.प्र में मनरेगा के तहत सीधी जिले से 31 जून को भुगतान की बात हो, जिला श्योपुर में मजदूरों को बिसलरी की बाॅटलों से पानी पिलाने का मामला हो या मप्र के मंत्रियों के भावनात्मक बुद्धि की परीक्षण रिपोर्ट हो, सब जगह सूचना का अधिकार ने अपने जन्म को सार्थक किया है। सूचना का अधिकार ने अपने जन्म को सार्थक किया है। सूचना का अधिकार कानून की धारा 26 के तहत जनता को जागरूक करने की जिम्मेदारी सरकार की है, लेकिन यह कटु सत्य है कि मप्र में राजनेताओं के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापन में करोड़ों रूपए खर्च करने वाली सरकार ने इस अधिनियम के लागू होने से आज तक एक भी विज्ञापन इस कानून के प्रचार-प्रसार के लिए नहीं जारी किया। राज्य सरकारें यह बात अच्छे से जानती हैं कि वह अधिनियम को एक सीमा से अधिक कंुद नहीं कर सकती है। इसके लिए बेहद चालाकी से सूचना आयोग को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ती है। सूचना आयोग के पास चंूकी अवमानना के प्रकरण में कार्रवाई करने की शक्ति नहीं है, इसलिए इसके आदेशों को सरकारी अधिकारी कचरे की टोकरी में डालने से भी नहीं चूकते हैं। पिछले वर्ष अक्टूबर माह में मेरे अनुरोध पर तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त पीपी तिवारी ने अधिनियम के तहत प्रदत्त अधिकार का उपयोग करते हुए राज्य सरकार को सिफारिश की थी कि राज्य के स्कूल शिक्षा पाठ्यक्रम में सूचना का अधिकार अधिनियम शामिल किया जाए, जिससे बच्चे गंभीर और जिम्मेदार नागरिक बन सकें, लेकिन आज तक शासन ने उस पर अमल नहीं किया।
आम व्यक्ति को लोकहित में सूचना का अधिकार प्रदान किया गया है । जो विषय वस्तु लोकहित से संबंधित है । वह सूचना के अधिकार में शामिल है । सूचना के अधिकार से आम जनता को यह लाभ प्राप्त है कि लोक प्राधिकारी जो कार्य करेंगे उसकी जानकारी रहेगी । यदि वह मनमाने तौर पर काम करते है तो उस पर रोक लगाई जा सकेगी । यदि उनके द्वारा सरकारी कार्य करने में हीला हवाला किया जाता है, वे कार्य में उपेक्षा बरतते है, जिससे शासकीय कार्य में मनमानी भ्रष्टाचार, लालफीताशाही, भाई-भतीजावाद को बढावा देते है तो उन पर रोक लगाई जा सकेगी । पारदर्शिता आएगी तथा नागरिकों के प्रति जवाबदेही बढेगी । उचित ढंग से कार्य करने की भावना/मानसिकता विकसित होगी ।
देश को स्वच्छ प्रशासन प्राप्त होगा । नागरिकों की सामान्य सुविधाए प्राप्त करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पडेगा लोकहित में मानक स्तर के कार्य होंगे । घटिया निर्माण कार्य पर रोक लगेगी । यही कारण है कि सूचना का अधिकार ’’सुशासन की कुंजी’’ माना गया है । इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी रिकार्ड चुस्त दुरूस्त सूची बद्ध कम्प्यूटरीकृत रखे जावे।
आर.टी.आई. कानून लागू होने के बाद सरकारी विभागों से मांगी जा रही सूचनाओं के कारण अनेक घोटालों का पर्दाफास हुआ है । घोटालो में फसने वाले नेताओं और अफसरों की नींद हराम हुई है । आर.टी.आई. की सूचना जुटाकर घोटालों का भंडफोड करने में अनेक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है । पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें समय-समय पर डराया धमकाया जाता है । समाज के संगठन काम करने वाले ऐसे आर.टी.आई. कार्यकताओं की सुरक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है । सरकार ऐसे कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करें ।
आर.टी.आई. कानून ने भ्रष्ट नेता और अफसरों की नाक में दम कर रखा है । सही कारण है कि अवैध खनन करने वालो के कारनामों को उजागर करने वाले गुजरात के अमित जेठवा जमीन घोटालों का सच सामने लाने वाले पुणें के सतीश सेठी औरअहमदाबाद के नदीम सैयद जैसे तमाम कार्यकर्ताओं को अपनी जान तक गवानी पडी है । सूचना का अधिकार कानून जैसे-जैसे सशक्त बन कर उभर रहा है । वैसे-वैसे भ्रष्ट लोगों की लाबी भी सामने आ रही है । लेकिन चंद लोगों की हत्या या कुछ लोगों को डराने धमकाने से सूचना के अधिकार की ारदर्शिता आएगी तथा नागरिकों के प्रति जवाबदेही बढेगी । उचित ढंग से कार्य करने की भावना/मानसिकता विकसित होगी ।
देश को स्वच्छ प्रशासन प्राप्त होगा । नागरिकों की सामान्य सुविधाए प्राप्त करने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करना पडेगा लोकहित में मानक स्तर के कार्य होंगे । घटिया निर्माण कार्य पर रोक लगेगी । यही कारण है कि सूचना का अधिकार ’’सुशासन की कुंजी’’ माना गया है । इसके लिए आवश्यक है कि सरकारी रिकार्ड चुस्त दुरूस्त सूची बद्ध कम्प्यूटरीकृत रखे जावे।
आर.टी.आई. कानून लागू होने के बाद सरकारी विभागों से मांगी जा रही सूचनाओं के कारण अनेक घोटालों का पर्दाफास हुआ है । घोटालो में फसने वाले नेताओं और अफसरों की नींद हराम हुई है । आर.टी.आई. की सूचना जुटाकर घोटालों का भंडफोड करने में अनेक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पडा है । पुलिस प्रशासन द्वारा उन्हें समय-समय पर डराया धमकाया जाता है । समाज के संगठन काम करने वाले ऐसे आर.टी.आई. कार्यकताओं की सुरक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है । सरकार ऐसे कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करें ।
आर.टी.आई. कानून ने भ्रष्ट नेता और अफसरों की नाक में दम कर रखा है । सही कारण है कि अवैध खनन करने वालो के कारनामों को उजागर करने वाले गुजरात के अमित जेठवा जमीन घोटालों का सच सामने लाने वाले पुणें के सतीश सेठी औरअहमदाबाद के नदीम सैयद जैसे तमाम कार्यकर्ताओं को अपनी जान तक गवानी पडी है । सूचना का अधिकार कानून जैसे-जैसे सशक्त बन कर उभर रहा है । वैसे-वैसे भ्रष्ट लोगों की लाॅबी भी सामने आ रही है । लेकिन चंद लोगों की हत्या या कुछ लोगों को डराने धमकाने से सूचना के अधिकार की मुहीम रूकने वाली नहीं है ।
जरूरत है तो ऐसे लोगों का साथ देने का और ऐसे प्रशासन पर दबाव बनाने की कि वह भ्रष्ट नेता, अफसरों, के प्रभाव में आकर ऐसा कोई काम न करने पायें जिससे कानून से खिलवाड होता दिखाई दे।